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Ghazal

hosho khirad shoor ke aane mein mar gaye Ghazal

होशो ख़िरद शऊर के आने में मर गये
कितने तबीब मर्ज़ मिटाने में मर गये !!

कुछ लोग थे खड़े की तबाही शुरू करें
कुछ लोग थे जो बात बनाने में मर गये !!

किसकी मज़ाल थी जो मुकाबिल में हो खड़ा
लेकिन हम अपनी जान बचाने में मर गये !!

अफसोस ये नहीं की नशेमन नहीं रहा
अफसोस लोग आग लगाने में मर गये !!

ज़ाहिर करो की हो सके मुमकिन इलाजे ग़म
वर्ना कई तो सदमें छुपाने में मर गये !!

हालां की ये चलन है मगर देखता हूँ मैं
कितने शिकम की भूख मिटाने में मर गये !!

शिकवा नहीं दुरुस्त ये नस्ले जदीद पर
हम लोग चार पैसे कमाने में मर गये !!

ये बे शऊर क्यूँ ना रहें फिक्रमंद अमीन
अहेले ख़िरद तो नाचने गाने में मर गये !!

!! मोहम्मद अमीन फैज़ाबादी !!

 

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