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desh bhakti ghazal

dekha nahi kabhi chasma utaarkar desh bhakti ghazal

देखा नही कभी भी चश्मा उतारकर
उसने सभी को परखा सिक्का उछालकर ।
 
अजमा रहा है कबसे वो मेरी ताकतें
खुदको युँ बार बार ही ख़तरे में डालकर ।
 
वो मौत के जबड़ों से लाया था ज़िन्दगी
हैरत को रख दिया था हैरत में डालकर ।
 
लोहे को लोहा काटता है ये दिखा दिया
तूफान से लड़ने को तूफान पालकर ।
 
उसने बढाई मुश्किलों की मुश्किलें सदा
संकट को मार डाला संकट में डालकर
 
डर को डराया उसने बाज़ार में सदा
खम ठोंक दी हमेशा आँखे निकालकर ।
 
वो सारी परिशानियों को हँसके पी गया
वो गम को खा गया है सकते में डालकर।
 
उसने निभाई रंजिश ख़ंजर भी मारके
उसने निभाई दोस्ती ख़ंजर निकालकर ।
 
औरों की बेटियों पर उनकी रही नज़र
अपनी रखी थी ‘सागर’ सबने संभालकर ।
 
लेखिका : वीणा शर्मा ‘सागर’

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